माँ ही बच्चों की असली गुरु, संस्कारों से संवरता है भविष्य: पूज्या दिव्या देवी।

दमोह-/ तहसील के समीपस्थ ग्राम बेली में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन भक्ति की रसधारा बही। कथा व्यास परम पूज्या दिव्या देवी जी ने अपनी ओजस्वी वाणी से बच्चों के चरित्र निर्माण में माँ की भूमिका और पितृ कृपा के महत्व पर प्रकाश डाला।
संस्कारों की जननी है माँ
कथा के दौरान पूज्या देवी जी ने कहा कि एक बालक का भविष्य उसकी माता की गोद में आकार लेता है। उन्होंने जोर देकर कहा:
*प्रथम पाठशाला-* माँ ही बच्चे की सबसे पहली और असली गुरु होती है।
*संस्कारों का बीजारोपण-* बचपन में माँ जो संस्कार रूपी बीज बोती है, वही आगे चलकर विशाल वटवृक्ष बनकर समाज को नई दिशा देते हैं।
*नैतिक योग्यता-* यदि माँ बच्चों को संस्कृति और संस्कारों से जोड़कर रखे, तो उनका भविष्य कभी अंधकारमय नहीं हो सकता।
*पूर्वजों के आशीर्वाद से मिलता है कथा श्रवण का सौभाग्य भागवत महापुराण की महिमा बताते हुए उन्होंने पितृ पक्ष और वंश परम्परा पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि भागवत कथा का आयोजन केवल व्यक्तिगत प्रयास नहीं, बल्कि पूर्वजों के आशीर्वाद का प्रतिफल है “जब हमारे पूर्वज प्रसन्न होते हैं, तभी हमें भागवत कथा कराने और उसे सुनने का दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त होता है। यह कथा पितरों की आत्मा को शांति प्रदान कर उन्हें मोक्ष की ओर अग्रसर करती है।
कथा का प्रभाव और माहौल
तृतीय दिवस की कथा में भगवान के विभिन्न अवतारों और भक्ति के प्रसंगों को सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए।कथा पांडाल श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा, जहाँ आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुँचे।भजन और कीर्तन- कथा के बीच-बीच में देवी जी द्वारा गाए गए भजनों पर भक्त झूमने को मजबूर हो गए।
